पद्मश्री उमा शंकर पाण्डेय (जल पुरुष) | खेत पर मेड़,मेड़ पर पेड़ अभियान के जनक

पद्मश्री उमा शंकर पाण्डेय (जल पुरुष) | खेत पर मेड़,मेड़ पर पेड़ अभियान के जनक

 

Padma-Shri-Uma-Shankar-pandey | पद्मश्री डॉ. उमाशंकर पाण्डेय |

बुंदेलखंड में जल क्रांति के जनक

 

पद्मश्री डॉ. उमाशंकर पाण्डेय उत्तर प्रदेश के बांदा जनपद के जखनी गांव के निवासी, प्रख्यात समाजसेवी, पर्यावरणविद्, जल संरक्षण विशेषज्ञ और “जल पुरुष” के नाम से पूरे देश में प्रसिद्ध हैं। उन्होंने जल संकट से जूझ रहे बुंदेलखंड में पारंपरिक ज्ञान और सामुदायिक भागीदारी के माध्यम से जल संरक्षण की ऐसी मिसाल प्रस्तुत की, जिसे आज “जखनी मॉडल” या “जलग्राम मॉडल” के नाम से जाना जाता है। उनके अभियान “खेत पर मेड़, मेड़ पर पेड़” ने वर्षा जल संरक्षण, भूजल पुनर्भरण और टिकाऊ कृषि को नई दिशा दी।

प्रारंभिक जीवन

डॉ. उमाशंकर पाण्डेय का जन्म 5 फरवरी 1971 को उत्तर प्रदेश के बांदा जनपद के जखनी गांव में हुआ। बुंदेलखंड में लगातार पड़ते सूखे, गिरते भूजल स्तर और किसानों के पलायन ने उन्हें जल संरक्षण के क्षेत्र में कार्य करने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने सरकारी सहायता की प्रतीक्षा करने के बजाय समाज को साथ लेकर जल बचाने का अभियान शुरू किया।

“खेत पर मेड़, मेड़ पर पेड़” अभियान

वर्ष 1995 से प्रारंभ हुए उनके जनआंदोलन का मूल सिद्धांत था—

“खेत का पानी खेत में और गांव का पानी गांव में।”

इसी सोच से उन्होंने “खेत पर मेड़, मेड़ पर पेड़” का नारा दिया। इस मॉडल के अंतर्गत खेतों की मेड़बंदी, वर्षा जल को खेतों में रोकना, मेड़ों पर वृक्षारोपण, तालाबों का पुनर्जीवन और सामुदायिक जल प्रबंधन को बढ़ावा दिया गया। इस प्रयास से जखनी गांव जल संकट से बाहर निकला और देश का चर्चित “जल ग्राम” बन गया।

जल संरक्षण में योगदान

डॉ. उमाशंकर पाण्डेय ने लगभग तीन दशकों से अधिक समय तक भूजल संरक्षण के लिए निरंतर कार्य किया है। उनके प्रयासों से—

  • जखनी गांव जल संरक्षण का राष्ट्रीय मॉडल बना।
  • भूजल स्तर में उल्लेखनीय सुधार हुआ।
  • वर्षा जल का अधिकतम संचयन संभव हुआ।
  • किसानों की सिंचाई पर निर्भरता कम हुई।
  • वृक्षारोपण और मेड़बंदी को जनआंदोलन का स्वरूप मिला।
  • देशभर में हजारों गांवों ने जखनी मॉडल से प्रेरणा ली।

लेखन एवं शोध

.उमाशंकर पाण्डेय जल संरक्षण, पर्यावरण, भूजल संवर्धन और टिकाऊ कृषि पर लगातार लेखन करते रहे हैं। उनके लेख राष्ट्रीय एवं क्षेत्रीय समाचार पत्रों, पत्रिकाओं तथा विभिन्न शोध प्रकाशनों में प्रकाशित हुए हैं। जल बचाओ–जीवन बचाओ विषय पर उनके विचारों ने नीति निर्माताओं, शिक्षाविदों, किसानों और सामाजिक संगठनों को प्रभावित किया है। उनके अनुभवों को जल प्रबंधन, सामुदायिक सहभागिता और ग्रामीण विकास के सफल उदाहरण के रूप में व्यापक मान्यता मिली है।

राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय पहचान

डॉ. उमाशंकर पाण्डेय के कार्यों की चर्चा देश-विदेश में हुई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी अपने “मन की बात” कार्यक्रम में उनके जल संरक्षण मॉडल का उल्लेख किया। भारत सरकार के जल शक्ति मंत्रालय ने उनके मॉडल के आधार पर अनेक जल ग्राम विकसित करने की पहल की।

सम्मान एवं पुरस्कार

  • पद्मश्री (2023) – भारत सरकार द्वारा सामाजिक कार्य एवं जल संरक्षण के लिए।
  • राष्ट्रीय जल योद्धा सम्मान (2020) – जल शक्ति मंत्रालय, भारत सरकार।
  • राष्ट्रीय जल प्रहरी सम्मान (2019)
  • डी.लिट्. (मानद उपाधि) – जल संरक्षण एवं समाज सेवा में उत्कृष्ट योगदान के लिए।
  • विभिन्न राष्ट्रीय एवं राज्य स्तरीय संस्थाओं द्वारा अनेक सम्मान।

पर्यावरण संरक्षण का संदेश

डॉ. उमाशंकर पाण्डेय का मानना है कि जल संकट का समाधान केवल सरकारी योजनाओं से नहीं, बल्कि जनभागीदारी से संभव है। उनका संदेश है—

“हर खेत पर मेड़, हर मेड़ पर पेड़ और हर बूंद का संरक्षण ही भविष्य की जल सुरक्षा की कुंजी है।”

आज डॉ. उमाशंकर पाण्डेय का जखनी मॉडल देशभर में जल संरक्षण का प्रेरणास्रोत है। बुंदेलखंड की सूखी धरती पर जल, हरियाली और समृद्धि का जो परिवर्तन उन्होंने सामुदायिक प्रयासों से संभव किया, वह ग्रामीण विकास, पर्यावरण संरक्षण और जल प्रबंधन का एक सफल उदाहरण माना जाता है। उनकी जीवन यात्रा यह सिद्ध करती है कि यदि समाज संगठित होकर प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण का संकल्प ले, तो बड़े से बड़ा जल संकट भी दूर किया जा सकता है।

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